Friday, October 4, 2019

सबका अपना देखने का नजरिया है
किन्तु प्राचीन वैदिक पद्धति को दोष देने से पहले कुछ और तथ्यों को समझना होगा

एकलव्य कोई असहाय नही था वह निषादराज पुत्र था मतलब वह सामान्य बालक नही था द्रोणाचार्य कौरवो और पांडवों के कुलगुरु थे जो कौरव और पांडव राजकुमारों को ही पढ़ते थे

शायद अपने ध्यान नही दिया द्रोण ने बहुत से ऐसी शिक्षये अर्जुन को दी जो अपने पुत्र अश्वस्थामा को भी नही दिया था

आखरी बात एकलव्य के धनुर्विद्य       को देखकर द्रोण इतने प्राभावित हुए की उसे आधुनिक धनुरबिद्या का जन्मदाता बना दिया

एकलव्य के अति मेधावी होने का पता जब द्रोण को चला तो उन्होंने एकलव्य का अंगूठा ले लिया उसके बाद द्रोण उसके गुरुभक्ति से इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने एकलव्य को मध्यमा और तर्जनी अंगुली से धनुष चलना सिखाया जो आज के आधुनिक धनुर्विद्या का मापदंड है

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