सबका अपना देखने का नजरिया है
किन्तु प्राचीन वैदिक पद्धति को दोष देने से पहले कुछ और तथ्यों को समझना होगा
एकलव्य कोई असहाय नही था वह निषादराज पुत्र था मतलब वह सामान्य बालक नही था द्रोणाचार्य कौरवो और पांडवों के कुलगुरु थे जो कौरव और पांडव राजकुमारों को ही पढ़ते थे
शायद अपने ध्यान नही दिया द्रोण ने बहुत से ऐसी शिक्षये अर्जुन को दी जो अपने पुत्र अश्वस्थामा को भी नही दिया था
आखरी बात एकलव्य के धनुर्विद्य को देखकर द्रोण इतने प्राभावित हुए की उसे आधुनिक धनुरबिद्या का जन्मदाता बना दिया
एकलव्य के अति मेधावी होने का पता जब द्रोण को चला तो उन्होंने एकलव्य का अंगूठा ले लिया उसके बाद द्रोण उसके गुरुभक्ति से इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने एकलव्य को मध्यमा और तर्जनी अंगुली से धनुष चलना सिखाया जो आज के आधुनिक धनुर्विद्या का मापदंड है
किन्तु प्राचीन वैदिक पद्धति को दोष देने से पहले कुछ और तथ्यों को समझना होगा
एकलव्य कोई असहाय नही था वह निषादराज पुत्र था मतलब वह सामान्य बालक नही था द्रोणाचार्य कौरवो और पांडवों के कुलगुरु थे जो कौरव और पांडव राजकुमारों को ही पढ़ते थे
शायद अपने ध्यान नही दिया द्रोण ने बहुत से ऐसी शिक्षये अर्जुन को दी जो अपने पुत्र अश्वस्थामा को भी नही दिया था
आखरी बात एकलव्य के धनुर्विद्य को देखकर द्रोण इतने प्राभावित हुए की उसे आधुनिक धनुरबिद्या का जन्मदाता बना दिया
एकलव्य के अति मेधावी होने का पता जब द्रोण को चला तो उन्होंने एकलव्य का अंगूठा ले लिया उसके बाद द्रोण उसके गुरुभक्ति से इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने एकलव्य को मध्यमा और तर्जनी अंगुली से धनुष चलना सिखाया जो आज के आधुनिक धनुर्विद्या का मापदंड है